अच्छा लगा कि मेरे लिखे को रेखांकित किया जा रहा है। इस अंक म मेरे लिखे को लेकर सावधानियां कम बयान की गयी थी अभिनंदन कुछ अधिक था। इस प्रकार के आयोजन का संभवत: यही चरित्र होता है।
लेखन म पचास की उम्र को मो परिपक्वता का पहला सोपान मानता हूँ। इस आयु तक आप न केवल बहुत कुछ लिख चुके होते हो अपितु एक जिज्ञासु के रूप म बहुत कुछ जान चुके होते हैं। आप अपनी एक पाठशाला तैयार कर चुके होते हो। आप अपने लिखे पर प्रशसाएं प्राप्त करते हो तो अपने उपर हुए हमले भी झेलते हो। आप अपने लिखे के गुण दोष पहचााने लायक भी हो जाते हो। सब नही होते हो। कुछ ताउम्र मुग्धा नायिका से अपने लेखन का आंनद उठाते हो और आलोचक को शत्रु ही मानते हो। मेरी समझ म इस प्रकार के विशेषांक एक पंथ अनेक काज करते हो। मेरा विश्वास है कि यह विशेषांक भी ऐसा ही करेगा।
लालित्य ललित के लिखे को रेखांकित किया जाने लगा है। उनके लिखे पर जहाँ एक ओर चित्रा मुद्गल, कमलकिशोर गोयनका, वेद राही, राहुल देव, दिविक रमेश, प्रताप सहगल, नंद भारद्वाज, सूर्यबाला, आबिद सुरती, प्रदीप पंत, मिथिलेश्वर, हरीश नवल, ज्ञान चतुर्वेदी, सुभाष चंदर, गिरीश पंकज, रमेश तिवारी, बुलाकी शर्मा जैसे अनेक रचनाधर्मी अपने सकारात्मक विचार व्यक्त कर रहे हो वही लालित्य ललित पर पत्र-पत्रिकाएं अंक प्रकाशित कर रही हो। वे लिख बहुत रहे हो तो उनके लिखे को प्रकाशित करने वाले प्रकाशक भी बहुत हो। यही कारण है उनकी लेखकीय जठराग्नि निरंतर प्रज्वलित है। यदि आप लिख रहे हो और प्रकाशक आपसे पीठ किए बैठा है तो आपकी जठराग्नि धीरे-धीरे मंद पड़ती जाती है। स्टोर म पड़ी पांडुलिपियां आपको स्टोररूम का रचनाकार बना देती हो। यह लालित्य ललित की लेखकीय जठराग्नि का ही परिणाम है कि जो जमीन उसने कविता म तोड़ी थी वही व्यंग्य म भी तोड़ रहे हो। पिछले दिनों, विभिन्न प्रकाशकों द्वारा उनके छह व्यंग्य संकलनों का प्रकाशन और उनके लोकार्पण पर कमलकिशोर गोयनका, राहुल देव, मधु आचार्य आशावादी, दिविक रमेश, प्रताप सहगल, अरविंद तिवारी, प्रज्ञा, रमेश तिवारी, के वक्तव्य, हाथ कंगन को आरसी जैसे हो। प्रसिद्ध पत्रकार और हिंदी के योद्धा, राहुल देव को भाषा पर लालित्य ललित की पकड़ जबरदस्त लगी। और जब हमारे समय के प्रसिद्ध कवि दिविक
रमेश कहते हो कि लालित्य ललित के व्यंग्य पहले से ज्यादा परिपक्व हुए हो तो ललित का व्यंग्य लेखन रेखांकित होता है। इस अवसर पर प्रताप सहगल ने एक बात कही थी इनकी सोच उजली है और इनके पास विषयों का वैविध्य है, जो विषय इनसे खुद अपने को लिखवा ले जाता है, इस शाब्दिक ताकत का मो कायल हूँ।’’
लालित्य ललित के पास विषयों की कमी नही है। अनेक बार तो ऐसा लगता है कि ललित के पास विषयों को अपनी रचना के लिए खींचने का कोई चुंबक है। जहाँ एक ओर अनेक रचनाकार विषय की खोज म दर-दर भटकतें हो और समझ नही आता कि क्या लिख उतने समय म लिखने को आतुर लालित्य ललित रचना का निर्माण कर डालते हो। एक साक्षात्कार म अपने इस स्त्रोत का रहस्य खोलते हुए लालित ने कहा भी है देखिए, चूंकि मो समाज म रहता हूँ, समाज की जितनी विसंगतियाँ, जितनी विडंबनाएँ हो, वह मुझसे कहती हो कि आप इस पर लिखो।
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